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बजह लेखनी कहानी -13-May-2022

हम आज आपस में लड़ने की कोई  बजह ढूढ़ते है।

क्यौ गुम हो गये हमारे वो पुराने दिन बजह ढूढ़ते है।।
क्यौ खुल रहे है इतने बृद्धाश्रम इसकी बजह ढूढ़ते है।
क्यौ फैल गयी  है अराजकता इसकी बजह ढूढ़ते है।।
क्यौ भूल गये है हम नारी का सम्मान बजह ढूढ़ते है।
क्यौ  हो रही है भ्रूण हत्या आज इसकी बजह ढूढ़ते है।।
क्यौ हुआ है हैवान आज इन्सान इसकी बजह ढूढ़ते है।
दुनियाँ में जिधर न हो कोई गम ऐसी कोई जगह ढूढ़ते है।।
हम हसते रहें हमेशा इसके लिए कोई सतह ढूढ़ते है।
क्यौ लांघ रहा सागर अपनी हद  इसकी बजह ढूढ़तेहै।।
कहाँ मिलेगी शान्ति इस धरती पर वो जगह ढूढ़ते है।
अब नहीं भटकैगे  अंधेरौ में प्यारी सी सुबह ढूढ़ते है।।

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13 Comments

Simran Bhagat

14-May-2022 08:42 PM

Nice👌👌

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Seema Priyadarshini sahay

14-May-2022 06:53 PM

बेहतरीन रचना

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Gunjan Kamal

14-May-2022 12:33 PM

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति 👌👌

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